सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के मुंबई बम धमाकों से जुड़े मामले में गैंगस्टर अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की याचिका को खारिज कर दिया है।

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Apla Nagpur Desk
10 Sept 2026, 10:36 AM IST · 2 मिनट वाचन
Source: Livelaw
सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की याचिका खारिज की
खास बातें
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सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की याचिका खारिज की।

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कोर्ट ने कहा कि उनकी जीवन कारावास की सजा बरकरार है, भले ही वे रिमिशन का दावा करें।

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सलेम की कैद की अवधि की गणना को कानूनी रूप से अस्वीकार्य माना गया।

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने गैंगस्टर अबू सलेम की याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने 1993 के मुंबई बम धमाकों से संबंधित जीवन कारावास से समय से पहले रिहाई की मांग की थी। यह निर्णय 10 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ द्वारा सुनाया गया, जिन्होंने स्पष्ट किया कि सलेम की जीवन कारावास की स्थिति अपरिवर्तित है, भले ही उन्होंने रिमिशन के संबंध में तर्क प्रस्तुत किए हों।

सलेम की कानूनी टीम ने तर्क किया कि उन्हें जो समय अंडरट्रायल के रूप में बिताया गया और अच्छे व्यवहार के लिए जो रिमिशन मिली, उसे भारत के पुर्तगाल के साथ किए गए प्रत्यर्पण समझौते में निर्धारित 25 वर्ष की सीमा में शामिल किया जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 25 वर्ष की अवधि उनके जीवन कारावास को निश्चित अवधि की सजा में नहीं बदलती है, और इस प्रकार सलेम के दावों को खारिज कर दिया।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले अप्रैल 2025 में सलेम की याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि 25 वर्ष की अवधि केवल नवंबर 2030 में समाप्त होगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस गणना में रिमिशन को शामिल करना समय से पहले और गलत था। सलेम के बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि उन्होंने अच्छे व्यवहार के लिए लगभग तीन साल और दो महीने की रिमिशन अर्जित की है, यह तर्क करते हुए कि अन्य दोषियों को समान विचारों से लाभ मिला है।

इस निर्णय के प्रभाव सलेम के मामले से परे हैं, क्योंकि यह प्रत्यर्पण समझौतों की अखंडता और भारत में जीवन कारावास की सजा के कानूनी ढांचे को मजबूत करता है। कोर्ट का यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का पालन किया जाए, जबकि देश के भीतर कानून के शासन को बनाए रखा जाए। यह निर्णय भविष्य में समान मामलों के लिए व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

आगे देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय प्रत्यर्पण आश्वासनों की व्याख्या और जीवन कारावास की सजाओं के प्रबंधन के संबंध में एक स्पष्ट मिसाल स्थापित करता है। जैसे-जैसे 25 वर्ष की अवधि 2030 में समाप्त होने के करीब पहुंचती है, यह देखना दिलचस्प होगा कि यह निर्णय भविष्य में कानूनी तर्कों और समान परिस्थितियों में कैदियों के उपचार को कैसे प्रभावित करेगा। कोर्ट की स्थिति कानूनी सिद्धांतों के प्रति सख्त अनुपालन को दर्शाती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रत्यर्पण समझौतों की शर्तों का सम्मान किया जाए।

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